चरवाही

श्रृंखला 4

आत्मा और जीवन

पाठ सात – जीवन का आभास

इफ 4:9-वे सुन्न होकर यहां तक लुचपन में लग गए कि सब प्रकार के गन्दे काम करने के लिए लालायित रहते हैं।

रो- 8:6-शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है।

जब हम मसीह में विश्वास करते हैं और जीवन में उसके साथ जुड़ जाते हैं, तो उसका जीवन हमारे अंदर एक जीवन की चेतना को उत्पन्न करता है, और हम जो उनके साथ जुड़ गए हैं, जो उसके साथ एक आत्मा हैं और जो उसे अनुभव करते हैं, उन्हें अपने आत्मिक जीवन में इस अनुभूति पर ध्यान देना चाहिए और इसका अनुसरण करना चाहिए।

मृत्यु की अनुभूति

नकारात्मक पक्ष से जीवन की चेतना, मृत्यु की एक अनुभूति है, एक प्रकार की नकारात्मक अनुभूति। इसे निश्चित रूप से रोमियों 8:6 में प्रकट किया गया है। हमें यह जानना चाहिए कि रोमियों 8:6 पूरी तरह से अनुभूति की एक आयत है क्योंकि यह कहती है कि शरीर पर मन लगाना मृत्यु है। यह केवल तथ्य नहीं है बल्कि यह एक अनुभूति की बात, एक चेतना की बात भी है। जब आप शरीर पर मन लगाते हैं आपको मृत्यु की चेतना होती हैं। आपको ऐसा लगता है कि मृत्यु है।

नकारात्मक पक्ष से (रो-8:16 मृत्यु की अनुभूति कमज़ोरी, खालीपन, तकलीफ, बेचैनी, निराशा, सूखापन, अंधकार, दर्द आदि की आतंरिक अनुभूति है। जब आप महसूस करते हैं कि आप अंदर से कमज़ोर, खाली, तकलीफ में, बेचैन, निराश, सूखा, अंधकार और दर्द में हैं, यह सूचित करता है कि मृत्यु वहाँ है। जब मृत्यु मौजूद है, इसका अर्थ है कि आप ने शरीर पर अपना मन लगाया है। हमारे दैनिक चाल की कुंजी मन है। कुंजी फाटक को खोलती है ताकि हम मार्ग पर चल सकें। शरीर पर मन लगाने का अर्थ शरीर के फाटक को खोलना है और शारीरिक रास्ते से चलना है। अतः जब आप महसूस करते हैं कि मृत्यु मौजूद है तो आपको यह एहसास होना चाहिए कि आप शरीर में जी रहे हैं और चल रहे हैं। यह जीवन की चेतना का नकारात्मक कार्य है।

जीवन और

शान्ति की अनुभूति

सकारात्मक पक्ष पर जीवन की चेतना हमें निम्नलिखित सकारात्मक चीजों का बोध देने के लिए कार्य करती है-शक्ति, संतुष्टि, शांति, विश्राम, मुक्ति, जीवंतता, सींचना, चमक, आराम, आदि (रो-8:6)। कमजोर होने के बजाय हम मजबूत हैं। खाली होने के बजाय हम संतुष्ट हैं। तकलीफ और बेचैनी के बजाय हमारे पास शांति और आराम हैं। निराशा के बजाय हमारे पास मुक्ति और जीवंतता हैं। जीवंतता एक प्रकार की जीवनशैली की दशा है। हमारे पास सूखापन के खिलाफ सींचना, अंधकार के खिलाफ चमक और दर्द के खिलाफ आराम की चेतना है। ये सभी जीवन की चेतना के कार्य की सकारात्मक अनुभूतियां हैं। जब हमें इस तरह की अनुभूतियां होती हैं तो हमें एहसास करना चाहिए कि ये जीवन की चेतना के कार्य हैं।

इसलिए, रोमियों 8:6 में सूचित की गयी मुख्य चीज जीवन की चेतना है। आत्मा पर मन लगाना जीवन और शांति हैं। यह पूरी तरह से अनुभूति और बोध की बात है। यह बोध जीवन की चेतना है। यह हमें केवल मार्गदर्शन करने के लिए नहीं है बल्कि हमे शासित करने, नियंत्रण करने और हमें निर्देशित करने के लिए भी कार्य करती है। मृत्यु की अनुभूति और जीवन और शांति की अनुभूति जीवन की चेतना के अर्थ के दो पहलू हैं।

विवेक की चेतना से

संबंधित होना

दोनों, नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष से जीवन की अनुभूति हमेशा विवेक के बोध से संबंधित है। इफिसियों 4:19 कहता है कि अविश्वासी ‘‘सुन्न’’ हो गए। यहाँ सुन्न मुख्य रूप से एक व्यक्ति के विवेक के बोध को संदर्भित करता है। आम तौर पर अविश्वासी अपने विवेक की अनुभूति की परवाह नहीं करते हैं। अपनी आंतरिक अनुभूति के विषय में सबसे लापरवाह लोग सबसे पापमय लोग होते हैं। अविश्वासी जो अच्छे व्यक्ति बनने का प्रयास करते हैं, वे निश्चित रूप से अपने भीतर की अनुभूति का ख्याल रखेंगे। सिर्फ कानून या पुलिस द्वारा शासित होना नैतिक मानक तक नहीं है। अविश्वासियों के साथ भी नैतिक मानक उनके विवेक की आंतरिक अनुभूति के अनुसार होना चाहिए। बेशक, एक विश्वासी के लिए जीवन की चेतना केवल विवेक की बात नहीं है बल्कि जीवन की चेतना अर्थात परमेश्वर के जीवन के अनुसार विवेक के बोध से संबंधित है।

जीवन की चेतना के कार्य

हमें अपने जीवन जीने के

स्रोत की जानकारी देना

यदि हम स्वभाविक जीवन में जी रहे हैं, तो चेतना मृत्यु की है और पूरी तरह से नकारात्मक पक्ष में है। तब हमें उसके सभी नकारात्मक बिंदुओं के साथ मृत्यु की अनुभूति होगी। यदि हम दिव्य जीवन में जीते हैं, तो चेतना जीवन की है और पूरी तरह से सकारात्मक पक्ष में है। तब हमें उसके सभी सकारात्मक बिंदुओं के साथ जीवन और शांति की चेतना होगी। जीवन की चेतना हमें जानकारी देती है कि हम स्वभाविक जीवन में जीते हैं या दिव्य जीवन में। जीवन की चेतना हमारा मार्गदर्शन करती है, शासित करती है, नियंत्रित करती है और हमें निर्देश देती है। आज की मसीहत में यह सत्य पूरी तरह से खो गया है। आज की मसीहत की अधिकांश शिक्षाएं नैतिकता और अच्छे व्यवहार पर केंद्रित हैं। वे जीवन की इस आंतरिक अनुभूति की परवाह नहीं करते हैं जो हमें जानकारी देने के लिए कार्य करती है कि हम स्वभाविक जीवन में जी रहे हैं या दिव्य जीवन में। चूंकि हम अपने जीवन के रूप में मसीह को खोज रहे हैं, हमें इस जीवन की चेतना का ख्याल रखना है। यदि हमारे पास शक्ति, संतुष्टि, शांति, विश्राम, मुक्ति, जीवंतता, सींचना, चमक, आराम इत्यादि की सकारात्मक अनुभूतियां नहीं हैं, तो हमें एहसास होना चाहिए कि हम दिव्य जीवन में नहीं जी रहे हैं_ यह हो सकता है कि हम स्वभाविक जीवन में जी रहे हैं।

हमें जानकारी देना कि

हम शरीर में जी रहे हैं

या आत्मा में

जीवन की चेतना का कार्य हमें जानकारी देना भी है कि हम स्वभाविक जीवन में जी रहे हैं या दिव्य जीवन में। स्वभाविक जीवन में जीना एक बात है और शरीर में जीना दूसरी बात है। आप सोच सकते हैं कि ये एक ही हैं लेकिन इनके बीच थोड़ा अंतर है। शरीर हमेशा बुरा है। कोई अच्छा शरीर नहीं है। लेकिन स्वभाविक जीवन कभी कभी अच्छा हो सकता है। स्वभाविक जीवन दिव्य जीवन के खिलाफ है और शरीर आत्मा के खिलाफ है।

इसलिए, जीवन की चेतना के कार्य के विषय में दो पहलू हैं। पहला पहलू हमें यह जानकारी देना है कि क्या हम दिव्य जीवन में जी रहे हैं और दूसरा पहलू हमें यह बताने के लिए है कि क्या हम अत्मा में जी रहे हैं। नकारात्मक रूप से कहते हुए, इससे हमें पता चलता है कि एक स्वभाविक व्यक्ति की तरह, क्या आप स्वभाविक जीवन जी रहे हैं और यह भी कि क्या आप शरीर में जी रहे हैं। हमारे अनुभव में हम हमेशा इन दो चीजों के बीच अंतर कर सकते हैं। कई बार हमें यह चेतना होती है कि हम शरीर में जी रहे हैं, चल रहे हैं और कार्य कर रहे हैं। कभी-कभी हम बहुत शारीरिक नहीं हैं लेकिन हमें तब भी चेतना होती है कि हम अपने स्वभाविक जीवन में, हमारे स्वभाविक मनुष्य में चल रहे हैं, दिव्य जीवन में नहीं।

इन बिंदुओं में प्रवेश करने के लिए हमें अधिक प्रार्थना की जरूरत है। यह पाठ अक्षर के अनुसार केवल ज्ञान का सिद्धांत नहीं होना चाहिए। यह हमारे अनुभव से जीवन का कुछ होना है। हमें अधिक प्रार्थना की जरूरत है ताकि हम इस जीवन की चेतना में प्रार्थना के द्वारा प्रवेश करें। फिर हमारा संदेश एक प्रकार की सहभागिता होगी, लोगों को बताते हुए कि हमने इन चीजों का अनुभव कैसे किया है, कैसे जीवन की चेतना हमारे लिए इतना असली और व्यवहारिक है और कैसे हम दिन प्रतिदिन हमारे भीतर इस तरह के नियंत्रण, मार्गदर्शन, निर्देश करने वाले तत्व के अधीन हैं।

 

THERE IS A CERTAIN SENSE OF LIFE

Various Aspects of the Inner Life— The Sense of Life – 738

1. There is a certain sense of life
With life of every kind;
And in th’ eternal life in us
It is a sense divine.

2. The higher any life may be,
The better is its sense;
The life divine the highest is
And has the highest sense.

3. It is the sense of life in us,
It is the sense of God;
‘Tis in our spirit made alive,
And more than sense of good.

4. It is the inner sense in us,
The inmost consciousness,
Discerning matters inwardly,
God’s will to thus express.

5. ‘Tis by this sense that God we know,
The sense of inner life;
‘Tis pow’rful and spontaneous,
And not of any strife.

6. The greater is our growth in life,
The keener is this sense;
The more we walk and act in life,
The more it is intense.

7. The sense of life when exercised
Will make our spirit bold,
And by this inner sense of God
True fellowship we hold.