चरवाही

श्रृंखला 4

आत्मा और जीवन

पाठ चार – आत्मा का अभ्यास करना

2 तीम- 1:6-7-इसी कारण मैं तुझे स्मरण दिलाता हूँ कि परमेश्वर के उस वरदान को प्रज्ज्वलित कर दे जो मेरे हाथ रखने के द्वारा तुझे प्राप्त हुआ है। परमेश्वर ने हमें भय की नहीं परन्तु सामर्थ्य, प्रेम और संयम का आत्मा दिया है।

हमारी मानवीय आत्मा का अभ्यास करना

आज जो भी हम सकारात्मक तरीके से अपनी आत्मा में करते हैं, वह एक प्रकार का अभ्यास है। यूनानी में अभ्यास के लिए शब्द अंग्रेजी शब्द कसरत के अधार पर है। कसरत में भाग लेने के लिए, अपने पूरे शारीरिक अस्तित्व का अभ्यास करने के लिए अपनी सारी उर्जा का प्रयोग करना चाहिए। हमें उसी तरह हमारी आत्मा का अभ्यास करना चाहिए। हमारे चारों ओर का माहौल अभ्यास करने के लिए हमारी मदद नहीं करता है। इसका इरादा हमें नीचे रखने का है। पूरी स्थिति हमें परिश्रम करने के लिए मदद नहीं करती है। यह हमें आलसी होने में मदद करती है_ यह हमें पीछे जाने में मदद करती है। यह एक ढालू प्रवाह है। ढालू प्रवाह हमारी नीचे जाने में मदद करता है। दरअसल, प्रवाह हमें ले जाता है। लेकिन यदि आप चढ़ाई पर जाते हैं, तो आपको अभ्यास करना होगा, और आपको संघर्ष करना होगा।

हमारी आत्मा जिसके साथ प्रभु है

उसका अभ्यास करने के द्वारा

भक्ति का अभ्यास करना

पहला तीमुथियुस 4:7 ‘‘भक्ति के लिए अपने आप को अनुशासित करने’’ के लिए कहता है। दूसरा तीमुथियुस 1:7 हमें बताता है परमेश्वर ने हमें भय का नहीं पर सामर्थ्य और प्रेम और संयम का आत्मा दिया है। फिर 2 तीमुथियुस 4:22 कहता है, प्रभु तेरी आत्मा के साथ रहे। जब हम इन सभी आयतों को एक साथ रखते हैं, तो हम देख सकते हैं कि भक्ति की ओर अभ्यास करना आत्मा के अभ्यास पर निर्भर करता है, जहां प्रभु है। यदि आप खुद को भक्ति तक अभ्यास करने जा रहे हैं, तो आपको यह जानना होगा कि अपनी आत्मा का अभ्यास कैसे करें क्योंकि स्वयं परमेश्वर आपकी आत्मा में है। ये आयतें आत्मा का अभ्यास करने के लिए पवित्रशास्त्रीय आधार हैं।

आत्मा का अभ्यास करने का तरीका

प्रभु के नाम को पुकारने के द्वारा

अपनी आत्मा का अभ्यास करने के रहस्यों में से एक प्रभु के नाम को पुकारना है। प्रभु के नाम को पुकारने को हम आत्मा का अभ्यास करने का सबसे अच्छा रहस्य मान सकते हैं। शायद, जब आप पहली बार प्रार्थना करना शुरू करते हैं, आप अपने मन में होते हैं_ लेकिन प्रार्थना में बहुत अभ्यास के बाद, आप धीरे-धीरे आत्मा में होंगे। और अधिक अभ्यास के बाद, आप एक बिंदु तक पहुंच जाएंगे कि जब भी आप प्रार्थना करते हैं, आप अपनी आत्मा में और अपनी आत्मा के साथ प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना केवल परमेश्वर से निवेदन के लिए नहीं बल्कि इससे अधिक परमेश्वर से संपर्क करने और संगति के लिए है। इसलिए, प्रार्थना करने का सबसे अच्छा तरीका प्रभु के नाम को पुकारना है। बाइबल हमें निरंतर प्रार्थना करने को कहती है (1 थिस- 5:17)। निरंतर प्रार्थना करने का एकमात्र तरीका प्रभु के नाम को पुकारना है।

परमेश्वर के वचन को प्रार्थना-पठन करने के द्वारा

प्रार्थना के साथ और प्रार्थना के द्वारा वचन को पढ़ना, वचन को प्रार्थना-पठन करना, वचन को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका है। केवल पढ़ने के लिए हमारी आंखों की और हमारी समझ, हमारी मानसिकता की आवश्यकता होती है। लेकिन परमेश्वर के वचन को अपने अस्तित्व की गहराई में प्राप्त करने के लिए, हमारी आत्मा की आवश्यकता होती है, और हमारी आत्मा का अभ्यास करने का प्रचलित तरीका प्रार्थना करना है। जब भी हम प्रार्थना करते हैं, हम स्वाभाविक रूप से अपनी आत्मा का अभ्यास करते हैं। तब जो हम अपनी आखों से पढ़ते हैं और अपनी मानसिकता में समझते हैं, हमारी प्रार्थना के माध्यम से हमारी आत्मा में जाएगा। बाइबल में हर शब्द को हमारे प्रार्थना-पठन की आवश्यकता होती है।

प्रार्थना के द्वारा आत्मा का अभ्यास करना

प्रार्थना करने के द्वारा हमें हमारी आत्मा का अभ्यास करना शुरू करना है, क्योंकि सिद्धांत में, प्रार्थना करना, आत्मा में कुछ है (इफ- 6:18)। यदि हम अपनी आंखों का अभ्यास करने जा रहे हैं, तो हमें देखना होगा। यदि हम अपने पैरों का अभ्यास करने जा रहे हैं, तो हमें चलना होगा। जितना अधिक हम चलते हैं, उतना अधिक हम अपने पैरों का अभ्यास करते हैं। इसी तरह, हमारे लिए अपनी आत्मा का अभ्यास करने का सबसे अच्छा तरीका प्रार्थना करना सीखना है।

 

EXERCISE THE  SPIRIT (PRAYER)

Prayer—Exercising  the Spirit – 781

1. Exercise the spirit,
Pray in every way!
I have prayed too little,
Keen my spirit, nay.
Even when I prayed, my
Spirit seldom proved
Even just to follow
As Thy Spirit moved.

2. Now I’d pray in spirit
As Thy Spirit groans;
Pray by the anointing,
Not as memory owns.
Not the mind applying,
But with spirit pray,
Praising or beseeching,
Spirit-led alway.

3. Not just by myself my
Spirit exercise,
But with others praying
I would do likewise;
Praying in the spirit,
As the spirit wants,
For ’tis in the inmost
Spirits have response.

4. When we serve together,
We thru prayer would move,
Fellowship in spirit,
Not in word to prove.
Never pray together,
Shouting, crying much,
Yet the fellowship in
Spirit never touch.

5. Exercise the spirit
Here and everywhere,
Few or many present,
Caring not who’s there.
Not a place or person
Will influence me,
In all kinds of meetings
I’ll my spirit free.

6. Thus my spirit lifted
Gives the Lord His way;
Thus, my spirit strengthened,
I’ll be used each day.
In the spirit’s flowing
Living water see;
Thus the saints are mingled,
Built the church will be.