चरवाही

श्रृंखला 4

आत्मा और जीवन

पाठ पंद्रह – अनुरूपीकरण

रो- 8:29-30-क्योंकि जिनके विषय में उसे पूर्वज्ञान था, उसने उन्हें पहले से ठहराया भी कि उसके पुत्र के स्वरूप में हो जाएं, जिससे कि वह बहुत-से भाईयों में पहलौठा ठहरे; फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया है, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है।

परमेश्वर के पहिलौठे पुत्र के

स्वरूप के अनुरूप होना

हम परमेश्वर के पहलौठे पुत्र के स्वरूप में कैसे अनुरूप हो सकते हैं? यह जानने के लिए कि हम परमेश्वर के पहलौठे के स्वरूप में कैसे अनुरूप हो सकते हैं, हमें समझना होगा कि परमेश्वर का पहलौठा कैसे इस धरती पर जीया। परमेश्वर का पहलौठा पुत्र, परमेश्वर का पुत्र और मनुष्य का पुत्र दोनों है। वह परमेश्वर-मनुष्य है और उसने धरती पर एक मानव का जीवन जीया। जो जीवन उसने इस धरती पर जीया वही परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि करते वक्त चाहा की मनुष्य जीये। जो जीवन परमेश्वर चाहता था कि मनुष्य जीये, पतन के बाद, मनुष्य जी नहीं पाया। अतः परमेश्वर के एकलौते पुत्र मनुष्य का पुत्र बनने के लिए आया। चारों सुसमाचारों में, शुरूआत से आखिर तक, प्रभु ने अपने आप को मनुष्य का पुत्र कहा (मत्ती- 8:20; 26:64); वह एक मनुष्य के जैसे इस धरती पर जीया। क्रूस की परछाई के अधीन वह अपने आप को हर दिन तिरस्कार और क्रूसीकृत करते हुए, वह हर दिन मनुष्य की तरह जीता था। उसने लोगों से कहा कि जो भी वचन उसने कहा है स्वयं से नहीं कहा है और जो भी काम उसने किया है वह खुद की इच्छा के अनुसार नहीं किया है (यूहन्ना 8:28-29; 5:19; 14:10)। उसने अपने पिता की इच्छा के अनुसार वचन बोला और काम किया। ऐसा करने से उसने परमेश्वर के न्यायिक मांग को पूरा किया। इस कारण वह योग्य बना कि हमारे लिए क्रूस पर मरा। साढ़े तैंतीस साल के लिए धरती पर अपने मानवीय जीवन में प्रभु यीशु परमेश्वर द्वारा परीक्षित और परखा गया था। आखिरकार, परमेश्वर के न्यायिक रूप से धार्मिकता की आवश्यकता के अनुसार, वह हमारे पापों को उठाने और हमारे लिए मरने के लिए क्रूस पर जाने योग्य था। परमेश्वर ने उसे एक पापी और यहां तक कि पाप भी माना (2 कुर- 5:21), और क्रूस पर उसे दण्ड दिया। उसकी मृत्यु पूरी तरह से एक न्यायिक बात थी जो परमेश्वर की धार्मिकता की आवश्यकता को न्यायिक रूप से पूरा करने के लिए थी। यह वह था जो उसने मनुष्य के पुत्र के रूप में किया था। मनुष्य के पुत्र के रूप में उसने जो क्रसीकृत जीवन इस धरती में जीया वह एक सांचा बन गया। हमें ऐसे सांचे के अनुरूप होना चाहिए।

प्रभु की मृत्यु के अनुरूप होना

संक्षेप में, अनुरूपीकरण, जीवन में विश्वासियों के रूपांतरण की परिपूर्णता है, और परमेश्वर के पहलौठे पुत्र जो परमेश्वर-मनुष्य के रूप में मसीह है, उनके स्वरूप में अनुरूप भी होना है। परमेश्वर के पहलौठे पुत्र के स्वरूप में अनुरूप होने का मतलब विश्वासी का परमेश्वर-मनुष्य के रूप में जीवन में पूर्ण विकसित होना है। यह मसीह के पुनरुत्थान की शक्ति के द्वारा सब वस्तुओं में उसकी मृत्यु के अनुरूप होना है (फिल. 3:10) और परमेश्वर मनुष्य, यीशु मसीह की आत्मा की भरपूर पूर्ति के माध्यम से उसे बड़ाई देने के लिए मसीह को जीना है (1:19-21)। यह परमेश्वर-मनुष्य, मसीह का पुनर्मुद्रण होना है, ताकि हम परमेश्वर के पहलौठे पुत्र के समान बनें (1 यूहन्ना 3:2)।

 

महिमा की आशा-

मसीह मुझ में

 

948

1 युगों से जो गुप्त था अब प्रकट हुआ
है मसीह, परमेश्वर की सच्चाई
वह खुदा का देहरूप और मेरा जीवन
होगा मेरी आशा की महिमा

महिमा महिमा मसीह मुझमें जीवन!
महिमा महिमा क्या ये आशा है!
अब मेरी आत्मा में वह रहस्य है!
तब वह मेरी महिमा भी होगा।

2  मेरी आत्मा में नया जन्म दिया,
प्राण को वह रूपांतरित कर रहा
बदलेगा वह देह को अपने ही तरह
बनाता मुझे अपनी तरह

3 अब जीवन, स्वभाव में मेरे साथ एक है
फिर उसमें, महिमा, हम होंगे
सदा उपस्थिति को आनंद करेंगे
पूर्ण अनुरूपता में उसके साथ