चरवाही

श्रृंखला 3

भरोसा और आज्ञाकारिता

पाठ ग्यारह – तथ्य, विश्वास और अनुभव

इफ- 2:8-क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है-और यह तुम्हारी ओर से नहीं वरन् परमेश्वर का दान है।

अनुग्रह के वर्तमान युग में, सब कुछ अनुग्रह से है (इफ- 2:8)। अनुग्रह से सब कुछ होने का मतलब है कि सब कुछ परमेश्वर द्वारा किया गया है। मनुष्य को उद्धार पाने के लिए कुछ भी करने की जरूरत नहीं है क्योंकि ‘‘अब उसे जो काम करता है पारिश्रमिक देना अनुग्रह नहीं परन्तु देय माना जाता है’’(रो- 4:4)। क्योंकि परमेश्वर अनुग्रह के अनुसार मनुष्य से व्यवहार करता है, कुछ निश्चित तथ्य हैं।

तथ्य

परमेश्वर ने मनुष्य के लिए सब कुछ पूरा किया है। चूंकि सब कुछ पूरा हो चुका है, कुछ तथ्य  मौजूद है। और क्योंकि ये मौजूद तथ्य है, मनुष्य को पहले से ही पूरे की गयी चीजों को पूरा करने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर के सभी काम पूरे हो गये है।

हालांकि, परमेश्वर का अनुग्रह एक धर्मी अनुग्रह है, इसीलिए, ‘‘तथ्यों’’ के साथ फिर भी मानव सहयोग की आवश्यकता है। किस प्रकार का सहयोग है यह? यह उसमें कुछ भी और नहीं जोड़ना है जो उसने पूरा कर दिया है बल्कि मनुष्य को यह मानना है कि जो परमेश्वर ने किया है वह वास्तविक है। यह विश्वास है।

विश्वास

विश्वास यह स्वीकार करना है कि परमेश्वर ने जो कहा है और किया है, वह सच है। विश्वास तथ्यों को स्वीकार करता है यानी उनको तथ्यों के रूप में अंगीकार करना है।

विश्वास चेक  भजाने की तरह है। मैं चेक भजाने शब्द का इस अर्थ में उपयोग करता हूँ जैसे कि एक व्यक्ति बैंक में चेक भजाता है। मान लीजिए की कोई आपको चेक देता है। बैंक के पास पैसा होना एक तथ्य है। पैसों के लिए चेक भजाना  इस तथ्य को स्वीकार करना है कि चेक पर जो राशि लिखी गयी है, वह बैंक के पास है। चेक भजाने के लिए विश्वास होना चाहिए। विश्वास के साथ, कोई नकद ले सकता है और इस तरह उपयोग करने के लिए पैसा रख सकता है। अब, पैसा खर्च करना अनुभव है। बैंक में पैसा होना तथ्य है, चेक को भुनाना विश्वास है, और पैसों को खर्च करना अनुभव’’ है। परमेश्वर के अनुग्रह में, जो उसने मनुष्यों के लिए किया है वे तथ्य हैं। लेकिन मनुष्य को इन तथ्यों को अनुभव करना होगा।

अनुभव

परमेश्वर के अनुग्रह को अनुभव करना उन तथ्यों का दावा करना है जो परमेश्वर ने मनुष्य के लिए पूरे किये हैं। ये तथ्य परमेश्वर द्वारा पूरे किये गये हैं। मनुष्य की जरूरत विश्वास है। तथ्य परमेश्वर से संबधित हैं और अनुभव मनुष्य से संबंधित है। इसलिए, विश्वास परमेश्वर का तथ्य है जो मनुष्य का अनुभव बनता है। जो बाइबल हमें दिखाती है वह बस ‘‘तथ्य, विश्वास और अनुभव’’ है।

तथ्य बनाम अनुभव

हमें तथ्य और अनुभव के बीच के अंतर के विषय में बहुत स्पष्ट होना चाहिए। ये दो चीजें दो भिन्न पहलू हैं। पहली बात में, यह वह है जो परमेश्वर ने हमारे लिए पूरा किया है_ यह वह स्थान है जो परमेश्वर ने हमें दिया है। दूसरी बात में, यह वह है जो हम अभ्यास करते हैं_ परमेश्वर ने जो हमें दिया है, यह उसका हमारा आनंद है। वर्तमान में, विश्वासी चरम तक जाते हैं। कुछ (वास्तव में, अधिकांश) लोग उस धन को नहीं जानते जो उनके पास प्रभु यीशु में है। वे नहीं जानते कि जो कुछ प्रभु यीशु ने पूरा किया है वह पहले से ही उनका है। वे अनुग्रह को प्राप्त करने के लिए योजना और उपाय बनाते हैं। परमेश्वर की मांग को पूरा करने के लिए और अपने नए जीवन की इच्छा को संतुष्ट करने के लिए वे अपने खुद के सामर्थ से सभी प्रकार की धार्मिकता के काम करने की कोशिश करते हैं। दूसरे (बहुत कुछं) सोचते हैं कि वे परमेश्वर के अनुग्रह को बहुत अच्छे से जानते हैं। वे सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने उन्हें पहले से ही एक अतुलनीय स्थान पर ऊंचा कर दिया है। वे पहले से ही संतुष्ट हैं और वे प्रभु यीशु से ग्रहण किए अनुग्रह को अनुभवी अभ्यास में लाने के लिए खोजते नहीं हैं। दोनों प्रकार के लोग गलत हैं। वे जो अनुभव पर ध्यान देकर तथ्य को भुला देते हैं, वे व्यवस्था से बाध्य हैं। वे जो तथ्य पर ध्यान देकर अनुभव को तुच्छ मानते हैं, वे विलासिता के लिए अनुग्रह को एक बहाना के रूप में लेते हैं। एक तरफ से, पवित्रशास्त्रें से एक मसीही को प्रभु यीशु में अपने उच्च स्थान को समझना होगा। दूसरी तरफ से, उसे परमेश्वर की ज्योति के तहत यह जांच करनी चाहिए कि उसका चाल-चलन उसकी बुलावट के अनुग्रह से मेल खाता है या नहीं।

विश्वास का अभ्यास करने की जरूरत

परमेश्वर ने हमें सबसे ऊंचे स्थान में रखा है। प्रभु यीशु के साथ हमारी एकता के द्वारा प्रभु की सभी उपलब्धियां और जीत हमारी है। यह तथ्य में हमारा स्थान है। सवाल अब यह है कि हम प्रभु यीशु की उपलब्धि और जीत को अनुभव कैसे कर सकते हैं। तथ्य और अनुभव के बीच, यानि कि, तथ्य के अनुभव में बदलने से पहले, परमेश्वर की उपलव्धि मनुष्य के अभ्यास में बदलने से पहले, विश्वास का कदम अभी भी है।

विश्वास का यह कदम उत्तराधिकार का ‘‘उपयोग’’ या ‘‘प्रबंधन’’ के सिवाय कुछ और नहीं है। प्रभु ने हमारे लिए एक वसीयत छोड़ी है। वह मर गया है और वसीयत अब प्रभाव में है। हमें अभी एक उदासीन या लापरवाह रवैया नहीं रखना चाहिए। इसके बजाय, हमें प्राप्त किये गये उत्तराधिकार को ‘‘उपयोग’’ करने के लिए खड़े होना चाहिए ताकि हम उत्तराधिकार के आशीष को आनंद या अनुभव कर सकें।

अब हमें जो जरूरत है वह और कुछ नहीं बल्कि परमेश्वर ने हमसे जो वादा किया है उसे विश्वास के द्वारा उपयोग करना है_ परमेश्वर ने प्रभु यीशु में हमारे लिए जो तैयार किया है हमें विश्वास के द्वारा उसका ‘‘लाभ उठाना’’ है। जो वसीयत उत्तराधिकार में पाने वाला है, उत्तराधिकार को आनंद और अनुभव करने से पहले उसे दो चीजें करनी हाेंगी। सबसे पहले, उसे विश्वास करना है कि एक उत्तराधिकार है—यदि हमारे पास यह विश्वास नहीं है, हम न केवल कोई आत्मिक अनुभवों की उम्मीद रख सकते हैं लेकिन हम परमेश्वर के विरूद्ध पाप कर रहे हैं और तो हम उसके कार्य पर शक कर रहे हैं। दूसरा, जो संसार में हैं, वे उत्तराधिकार का प्रबंध अपनी शारीरिक शक्ति से करते हैं। लेकिन हमें आत्मिक उत्तराधिकार का प्रबंध करने के लिए अपनी आत्मिक शक्ति का प्रयोग करना चाहिए, जो विश्वास है। चूंकि यह आत्मिक उत्तराधिकार पहले से ही हमारा है, हमें विश्वास के द्वारा प्रभु यीशु में अपने उत्तराधिकार का प्रबंध करने और उसका ‘‘लाभ उठाने’’, उपयोग करने के लिए एक कदम आगे बढ़ना चाहिए।

अभ्यास

तथ्य परमेश्वर के वादे, उसके छुटकारे, उसके कार्य और उसके मुफ्त उपहार हैं। विश्वास परमेश्वर में विश्वास करने, उसके कार्य और छुटकारे में भरोसा रखने, और उसके वादे का दावा करने के मनुष्य के तरीके को दर्शाता हैै। यह एक प्रकार का कार्य और रवैया है जिसके द्वारा परमेश्वर के तथ्य मनुष्य के अनुभव में रुपांतरित किये जाते हैं।

अनुभव विश्वासियों का उचित जीना है, जिसे वे परमेश्वर में विश्वास करने के द्वारा प्राप्त करते हैं। यह मसीह के जीवन की अभिव्यक्ति है जो विश्वासियों के जीने में अभ्यास किया जाता है। अनुभव मसीह की उपलब्धि और जीत का एहसास है। यह परमेश्वर के तथ्यों का व्यवहारिक लागू करना, अभिव्यक्ति और जीना है। बाइबल में अभिलिखित सभी संतों का इतिहास इस श्रेणी का है।

न केवल शिक्षकों को बल्कि सभी विश्वासियों को भी इन तीनों के बीच का अंतर्संबंध जानना होगाः तथ्य, विश्वास और अनुभव। अन्यथा, वे अपने जीने और शिक्षा में भ्रमित हो जाएंगे। इसके अलावा, उन्हें बाइबल पढ़ने में कई विरोधाभास और स्पष्ट असहमति मिलेगी।

 

गीत # 551

1 मैंने माना यह खबर
हाल्लेलूयाह मेमने की
बाहरी आँगन से बढ़ा
ओ महिमा खुदा की
मैं यीशु की ओर हूँ
वेदी पर हुआ पवित्र
संसार और पाप से मृत

हाल्लेलूयाह मेमने की!
हाल्लेलूयाह, हाल्लेलूयाह
मैं हूं पर्दे के उस पार
यहां महिमा न ढलती
हाल्लेलूयाह, हाल्लेलूयाह
मैं जी रहा राजा की उपस्थिति में

2 मैं एक राजा और याजक
हाल्लेलूयाह मेंमने की
लहू द्वारा पाप धुलते
हो महिमा खुदा की
आत्मा की शक्ति, प्रकाश
से मैं जीता हूं रात दिन
पवित्र जगह है उज्जवल
हाल्लेलूयाह मेंमने की!

3 बढ़ा बाहरी आँगन से
हाल्लेलूयाह मेंमने की
वहाँ खुदा का प्रकाश
हो महिमा खुदा की
पर लहु लाया अन्दर
स्वच्छ पवित्रता में
जहाँ पाप और स्वयं मरे
हाल्लेलूयाह मेंमने की

4  मैं हूँ पवित्र सीमा में
हाल्लेलूयाह मेंमने की
अन्दरूनी पर्दे के पार
हो महिमा खुदा की
मैं पवित्र खुदा में
लहु की शक्ति द्वारा
अब प्रभु मेरा घर
हाल्लेलूयाह मेंमने की!